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कल है?

कल क्या होगा यही सोच कर वो बहुत परेशान रहा,  और हर  रोज उसका आज हाथ से फिसलता रहा... 

हवा में नमीं रहने भी दो...

इन हवाओं में नमी अब रहने भी दो,  इमारतों की थोड़ी कमी रहने भी दो।  मिट रहे हैं खेत, जंगल, नदी औ घोंसले,  भावी के लिए थोड़ी जमीं रहने भी दो।  @© अमन कुमार वर्मा

फिर वही फ़िज़ा की रात...

वही फिज़ा की रात थी फिर तूने जब आवाज़ दी,  हम उसी घटा में उलझे थे,  जब नभ काला था,  थे चमकीले चमकीले तारे बस,  चंद्र सुस्त निंद्रा में था,  मंद पवन संग बरस रहा था अमृत रस।

अकेला सफ़र है जिंदगी

चलते चलते यूँ ही मिल गया था कोई कुछ पल मन बहल के लिए,  वरना सफर में हम अकेले ही थे... 

गाँव बना शहर

अब जब भी गुजरता हूँ उस गाँव से,  जिंदा पक्की सड़कें हैं, पर कुछ मरा सा,  चिलचिलाती धूप मे, धरती वो नंगी,  पीली चमकती घिसी आईना सा... @© अमन कुमार वर्मा

जिंदगी का सफ़र

गुजरने को जिंदगी गुजर ही जानी है,  गुजरते नहीं कि दिल ए गुबार बहुत है...  @© अमन कुमार वर्मा

मैं मुग्ध हुआ मर जाने को

मैं राग-द्वेष से मुक्त हुआ कुछ रहा न बाकी पाने को। हृदय माया से तृप्त हुआ मैं मुग्ध हुआ मर जाने को।।                        हे राधे!