फिर वही फ़िज़ा की रात...

वही फिज़ा की रात थी
फिर तूने जब आवाज़ दी, 
हम उसी घटा में उलझे थे, 
जब नभ काला था, 
थे चमकीले चमकीले तारे बस, 
चंद्र सुस्त निंद्रा में था, 
मंद पवन संग बरस रहा था अमृत रस।

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